श्री श्याम बाबा के पाठ

।। श्री श्याम चालीसा ।।

album-art

00:00

(स्वर- रिया शर्मा)

ॐ श्री श्याम देवाय नमः
दोहा: श्री गुरु चरण ध्यान धरि, सुमिरि सच्चिदानन्द।
श्याम चालीसा भणत हूँ, रच चौपाई छन्द।।

चौपाई
श्याम श्याम भजि वारम्वारा। सहज ही हो भवसागर पारा।।
इन सा देव न दूजा कोई। दीनदयाल न दाता होई।।
भीम सुपुत्र अहिलवती जाया। कही भीम का पौत्र कहाया।।
ये कथा सही कल्पान्त्र। तनिक न मानों इसमें अंतर।।
बरबरीक विष्णु अवतारा। भक्तन हेतु मनुज तनु धारा।।
वासुदेव देवकी पियारे। यशोमती मैया नन्द दुलारे।।
मधुसूदन गोपाल मुरारी। वृजकिशोर गोवर्धन धारी।।
सियाराम श्री हरि गोविंदा। दीनदयाल श्री बाल मुकुन्दा।।
दामोदर रणछोड़ बिहारी। नाथ द्वारिकाधीश खरारी।।
नरहरि रूप प्रहलाद पियारा। खम्ब फाड़ि हिरनाकुश मारा।।
राधा बल्लभ रुक्मण कांता। गोपी बल्लभ कंशंहनन्ता।।
मनमोहन चित्त चोर कहाये। माखन चोरि चोरि कर खाये।।
मुरलीधर यदुपति घनश्यामा। कृष्ण पतित पावण अभिरामा।।
मायापति लक्ष्मीपति ईशा। पुरूषोत्तम केशव जगदीश।
विश्वपति जय भुवन पसारा। दीनबन्धु भक्तन रखवारा।।
प्रभु का भेद न कोई पाया। शेष महेश थके मुनिराया।।
नारद शारद ऋषि योगिंदर। श्याम श्याम सब रटत निरंतर।।
कवि कोविद करि न सकै गिनन्ता। नाम अपार, अथाह अनंता।।
हर सृष्टि हर युग भाई। लीन अवतार भक्त सुखदाई।।
हृदय मांहि करि देखु विचारा। श्याम भजे तो हो निस्तारा।।
कीर पढ़ावत गणिका तारी। भीलनी की भक्ति बलिहारी।।
सती अहिल्या गौतम नारी। भई श्राप वश शिला दुखारी।।
श्याम चरण रज में चित्त लाई। पहुँची पती लोक में जाई।।
अजामील अरु सदन कसाई। नाम प्रताप परम गति पाई।।
जाके श्याम नाम आधारा। सुख लहहिं दुख दूर हो सारा।।
श्याम सुलोचन है अति सुन्दर। मोर मुकुट सिर तन पीताम्बर।।
गल वैजेन्ती माल सुहाई। छवि अनूप भक्तन मन भाई।।
श्याम-श्याम सुमिरहु दिन राति। शाम दुपहरि अरू परभाती।।
श्याम सारथी जिसके रथ के। रोडे दूर होय उस पथ के।।
श्याम भक्त न कहीं पर हारा। भीड़ पड़ी तब श्याम पुकारा।।

रसना श्याम नाम रस पी ले। जीले श्याम नाम के हीले।।
संसारी सुख भोग मिलेगा। अन्त श्याम सुख योग मिलेगा।।
श्याम प्रभु है तन के काले। मन के गोरे भोले भाले।।
श्याम संत भक्तन हितकारी। रोग दोष अघ नाशै भारी।।
प्रेम सहित जो नाम पुकारा। छन में हो भव सागर पारा।।
खाटू में है मथुरा वासी। पारब्रह्म पूर्ण अविनाशी।।
सुधा तान भरि मुरली बजाई। दिल्ली प्रान्त जहां सुनि पाई।।
वृद्ध बाल जेते नारी नर। मुग्ध भये सुनि बंशी के स्वर।।
हर वर कर पहुँचे सब जाई। खाटू में जहँ श्याम कन्हाई।।
जिसने श्याम स्वरूप निहारा। भव भय से पाया छुटकारा।।

दोहा: श्याम सलोने सांवरे, बरबरीक तनुधार।
ईच्छा पूरन मेरी प्रभु, करो न लगाओ बार।।

|| श्री श्याम चौरासी ||

album-art

00:00

(स्वर- नैना गुप्ता एवं प्रकाश ओडेका)

दोहा:
गुरुपद पंकज ध्यान घर, सुमिर सच्चिदानंद।
श्याम चौरासी भनत हूँ, रच चौपाई छन्द।

चौपाई:
महर करो जन के सुखरासी, सांवलशा: खाटू के वासी।
प्रथम शीश चरणों में नाव, किरपा दृष्टि रावरी चाँव।
माफ सभी अपराध कराऊँ, आदि कथा सुछन्द रच गाऊँ।
भक्त सुजन सुनकर हरषासी, सांवलशा: खाटू के वासी।

कुरु पाण्डव में विरोध छाया, समर महाभारत रचवाया।
बली एक बरबरीक आया, तीन सुबाण पास में लाया।
यह लखि हरि को आई हासी, सांवलशा: खाटू के वासी।

मधुर बचन तब कृष्ण सुनाये, समरभूमि केहि कारण आये।
तीन बाण धनु कंध सुहाये, अजब अनोखा रूप बनाये।
बाण अपार वीर सब ल्यासी, सांवलशा: खाटू के वासी।

बरबरीक इतने दल माहीं, तीन बाण की गिनती नाहीं।
योद्धा एक से एक निराले, वीर बहादुर अति मतवाले।
समर सभी मिल कठिन मचासी, सांवलशा: खाटू के वासी।

बरबरीक मम कहना मानो, समर भूमि तुम खेल न जानो।
द्रोण गुरु कृप आदि जुझारा, जिनसे पार्थ का मन हारा।
तू क्या पेश इन्हीं से पासी, सांवलशा: खाटू के वासी।

बरबरीक हरी से यों कहता, समर देखना मैं हूँ चाहता।
कौन बली रण शूर निहारू, वीर बहादुर कौन जुझारु।
तीन लोक एक बाण से मारू, हँसता रहूँ कभी न हारू।
सत्य कहूँ हरी झूठ न जानो, दोनों दल एक तरफ हो मानो।
एक बाण दल दोनों खपासी, सांवलशा: खाटू के वासी।

बरबरीक से हरी फरमावें, तेरी बात समझ नहीं आवे।
प्राण बचाओ तुम घर जावो, क्यों नादानपन दिखलाओ।
तेरी जान मुफ़्त में जासी, सांवलशा: खाटू के वासी।

गर विश्वास न तुम्हें मुरारी, तो कर लीजे जांच हमारी।
यह सुन कृष्ण बहुत हरषाये, बरबरीक से वचन सुनाये।
मैं अब लेऊ परीक्षा खासी, सांवलशा: खाटू के वासी।

पात विटप के सभी निहारो, वेध एक शर से सब डारो।
कह इतना इक पात मुरारी, दबा लिया पग तले करारी।
अजब रची माया अविनाशी, सांवलशा: खाटू के वासी।

बरबरीक धनुं बाण चढ़ाया, जानी जाय न हरी की माया।
बिटप निहार बली मुस्काया, अजित अमर अहिलवती जाया।
बली सुमिर शिव बाण चलासी, सांवलशा: खाटू के वासी।

बाण बली ने अजब चलाया, पत्ते वेध विटप के आया।
गिरा कृष्ण के चरणों माहीं, विधा पात हरी चरण हटाई।
इनसे कौन फते किमि पासी, सांवलशा: खाटू के वासी।

कृष्ण कहे बली बताओ, किस दलकी तुम जीत कराओ।
बली हार का दल बतलाया, यह सुन कृष्ण सनाका खाया।
विजय किस तरह पार्थ पासी, सांवलशा: खाटू के वासी।

छल करना कृष्ण ने विचारा, बली से बोले नन्द कुमारा।
ना जाने क्या ज्ञान तुम्हारा, कहना मानो बली हमारा।
हो निज तरफ नाम पा जासी, सांवलशा: खाटू के वासी।

कहे बरबरीक कृष्ण हमारा, टूट न सकता प्रण है करारा।
मांगे दान उसे मैं देता, हारा देख सहारा देता।
सत्य कहूँ ना झूठ जरासी, सांवलशा: खाटू के वासी।

बेशक वीर बहादुर तुम हो, जचते दानी हमें न तुम हो।
कहे बरबरीक हरी बतलाओ, तुमको चाहिए क्या फरमाओ।
जो मांगे सो हमसे पासी, सांवलशा: खाटू के वासी।

बली अगर तुम सच्चे दानी, तो मैं तुमसे कहूँ बखानी।
समर भूमि बली देने खातिर, शीश चाहिए एक बहादुर।
शीश दान दे नाम कमासी, सांवलशा: खाटू के वासी।

हम तुम अर्जुन तीनों माहीं, शीश दान दे को बलदाई।
जिसको आप योग्य बताये, वही शीश बलिदान चढ़ाये।
आवागमन मिटे चौरासी, सांवलशा: खाटू के वासी।

अर्जुन नाम समर में पावे, तुम बिन सारथि कौन कहावे।
मम शिर दान दिहों भगवाना, भारत देखन मन ललचाना।
शीश शिखर गिरि पर धरवासी, सांवलशा: खाटू के वासी।

श दान बरबरीक दिया है, हरि ने गिरि पर धरा दिया है।
समर अठारह रोज हुआ है, कुरु दल सारा नाश हुआ है।
विजय पताका पांडू फै रासी, सांवलशा: खाटू के वासी।

भीम, नकुल, सहदेव और पार्थ, करते निज तारीफ अकारथ।
यों सोचें मन में यदुराया, इनके दिल अभिमान है छाया।
हरि भक्तों का दुःख मिटासी, सांवलशा: खाटू के वासी।

पार्थ भीम आदि बलधारी, से यो बोले गिरिवरधारी।
किसने विजय समर में पाई, पूछो सिर बरबरीक से भाई।
सत्य बात सिर सभी बतासी, सांवलशा: खाटू के वासी।

हरि सबको संग ले गिरिवर पर, सिर बैठा था मगन शिखर पर।
जा पहुंचे झटपट नन्दलाला, पुनि पूछा सिर से सब हाला।
शीश दानी हैं खुद अविनाशी, सांवलशा: खाटू के वासी।

हरि यों कहे सही फरमाओ, समरजीत है कौन बताओ।
बली कहे मैं सही बताऊ, नहीं पितु चाचा बली न ताऊ।
भगवत्त ने पाई स्याबासी, सांवलशा: खाटू के वासी।

चक्र सुदर्शन है बलदाई, काट रहा था दल जिमी काई।
रुप द्रौपदी काली का धर, हो विकराल ले कर में खप्पर।

भर भर रुधिर पिये थी प्यासी, सांवलशा: खाटू के वासी।
मैने जो कुछ समर निहारा, सत्य सुनाया हाल है सारा।
सत्य बचन सुनकर यदुराई, वर दीन्हा सिर को हर्षाई।
श्याम रूप मम धर पुजासी, सांवलशा: खाटू के वासी।

कलि में तुम श्याम कन्हाई, पुजेंगे सब लोग लुगाई।
मन कर्म बचन जो ध्यायेंगे, मन इच्छा फल पायेंगे।
‘निम्बू’ सदगति को पा जासी, सांवलशा: खाटू के वासी।

भक्तों को धनवान बनाना, पत्नि गोद में सुवन खिलाना।
‘बनबारी’ है शरण तिहारी, श्रीपति यदुपति कुञ्जबिहारी।
सब सुखदायक आनंद रासी, सांवलशा: खाटू के वासी।

दोहा:
श्याम चौरासी है रची, भक्त जनन के हेत।
जो यह निशि वासर पढ़े, सफल सुमंगल देत।
लख चौरासी छुटिये, श्याम चौरासी गाय।
अक्षय चार फल पाय कर, आवागमन मिटाय।
सागर उपनाम है, कहे सब लादुराम।
सात्विक भक्त जग में जिते, उनको करूं प्रणाम।
शुक्लपक्ष ग्रह ग्रहशशी, पित्र पक्ष शुभ जान।
चन्द्रमा एकादशी कियो, पूर्ण गुण गान।।

।। श्री श्याम दुःख भंजनाष्टक ।।

album-art

00:00

(स्वर- प्रकाश ओडेका)

युद्ध समय दुहुँ पक्ष जुरै जब, बाण प्रताप जु तुम दिखलायो।

ताहि सो त्रास भयो सबको यह, वीर अजेय कहाँ तें है आयो।।

मांगि लियो तब शीर हरि करि, मोद दियो नहि नेकु संकारो।
को नहि जानत है जग में, तब नाम महादुःख भंजन हारो।।

संकट में जब भक्त परे कोई, श्यामहि श्याम रटे जु विचारो।
नीज तुरंग सवार महाप्रभु, आइवै ताहि को संकट टारो।।

संकट ग्रस्त बचाये किते जन, मोहिं भी आनिके बेगि उबारो।
को नहि जानत है जग में, तब नाम महादुःख भंजन हारो।।

धाई के कोई मनोरथ लेकछु, श्याम जू आन गहे तेरे द्वारो।
आरत बैन कहै जो निरन्तर, तेरो हूँ नाथ। न और सहारो।।

ऐसे दुखी अरु तप्त सुभक्त को हाथ पकरि प्रभु आय उबारो।
को नहि जानत है जग में, तब नाम महादुःख भंजन हारो।।

चौरन त्रास दई जन को तब ‘जात्री’ जु आवत ले उपहारो।
लुटि के माल जु लान लगै, तब अन्ध मये राह सुझारो।।

‘त्राहिकरि’ जब माल दियो सब, पायो महादुःख तै छुटकारो।
को नहि जानत है जग में, तब नाम महादुःख भंजन हारो।।

नौरंगशाह अनीति करि जब मन्दिर ते सब देव उखारी।
ताहि समय निज रूप अलौपि कै, लीन हुए प्रभु कूप मॅझारी।।

पाई समय पुन स्वप्न दरस दै श्यामजी कुंड ते नव तनु धरौं।
को नहि जानत है जग में है, तब नाम महादुःख भंजन हारो।।

देबी पहाड़ चड़ी भय तैं जब ठोर नहि बचने को जु पायो।
भैरव भागत भागत ही, तब ठोरे न एक बसे भय खायो।।

श्याम तुम्ही सब की पत राखी, औटि सबै खल सस्त्र पदारो।
को नहि जानत है जग में, तब नाम महादुःख भंजन हारो।।

जोरि के हाथ और शीश झुकाकरि, भेट चढ़ा फल इष्ट विचारे।
पावन चित्त ते ध्यान करे अरु आरत है तब नाम पुकारे।।

बेगि मनोरथ पूर्ण होंहि तब ऐसो प्रताप है तब उजियारो।
को नहि जानत है जग में, तब नाम महादुःख भंजन हारो।।

काज किये सब भक्तन के तुम श्याम महाप्रभु देखी विचारो।
कौन सो संकट है मेरो अड्यौ प्रभु जो तुमसे नहि जात है टारो।।

बेगि हरो श्री श्याम महाप्रभु जो कछु संकट होय हमारो।
को नहि जानत है जग में, तब नाम महादुःख भंजन हारो।।

श्याम देह ज्योति लसै, कुण्डल सुशोभित रूप।
दिव्य देह दारिद दलन, जै जै श्याम सुर भूप।।

।। श्री श्याम नेत्राष्टक ।।

album-art

00:00

(स्वर- प्रकाश ओडेका)

नीले पर असवार हाथ असि ले, करता सदा त्राण तू।

जो शरणागत ‘आर्तदीन’ बन, रखता सदा प्राण तू।।

तू ही एक अनन्य आश्रय, महा है आपदा ग्रस्त का।
तू करुणाकर है कृपाकर हे प्रभो, दे दृष्टि ‘भाग्येश’ को।।

भौमिनन्दन, नन्दनन्दन अहो जयलोक्य नंदन हैं तू।
नाना नाम, अनेक रूप, गुणयुक्त, संकट निकंदन हैं तू।।

भक्तों के दुःखकष्ट दूर करने, आता सदा तू दौड़ कर।
आ करुणाकर, कर कृपा वरद हे! दे दृष्टि ‘भाग्येश’ को।।

तेरी करुणा समस्त जग में है, भक्त जन रक्षिका।
तेरा तेज प्रताप व्याप्त, जग में दे दान तू अक्षिका।।

दे कर के निज शीश, ईश-पदवी पाई है तूने प्रभो।
कर करूणाकर वृष्टि इस स्वजन पर, दे दृष्टि अपने दासको।।

जाऊँ और कहाँ कि छोड़ तुमको, पाऊँ मनोरथ जहाँ।
है सूना संसार एक तुझ बिन, मेरे लिये तो यहाँ।।

आया हूँ दुःख दग्ध युग चरण में, तो रख प्रभो शरण में।
दे अब तो निज ध्यान दुखहरण में, दे दृष्टि अपने दासको।।

नहीं जाने क्या अपराध मम हुआ, जो काण्ड यह हो गया।
छोटा सा शिशु यह अबोध मति का, जो दृष्टि निज खो गया।।

तू जितना अनुदार दण्डनि में, उतना क्षमा में प्रबल।
तू करबद्ध युगल क्षमा जलधि हे! दे दृष्टि अपने दासको।।

तेरा मुख समुख खड़ा ही, ताकता रहता सदा शक्र है।
तेरे इगिंत मन्त्र से, चल संसार का चक्र है।।

सर्जन पालन में तथा प्रलय में, तू शक है सर्वथा।
लीलामय प्रकटा स्वकीय करुणा, दे दृष्टि अपने दासको।।

तेजो धाम महा प्रताप रवि, तू है कोटि सूर्योज्ज्वल।
तारा-ग्रह-नक्षत्र और शशि, सभी में है तेरा ही बल।।

हे श्रीकृष्ण चरण युगार्पित मन, बरचस्व प्राणादिक्।
हे अमित दानी प्रकाश पुंज भगवन, दे दृष्टि अपने दासको।।

हे सूर्योपम शीर्स मात्र छविमान, हे भक्त वत्सल प्रभो।
हे संसार विभूति ज्योति भवन! हे दीन आश्रय-विभो।।

हे सम दृष्टि दयालू अब विनय सुन हो, दास पर द्रवित तू।
दृष्टि फेर इधर अबोध शिशु पर, दे दृष्टि अपने दासको।।

यह नयनाष्टक भक्तियुक्त चित से, जो दीन होकर पढ़े।
श्यामानुग्रह से सफल हो, सब कष्ट संकट कटे।।

अन्धे और अवोध दीन शिशु को, है दृष्टि इससे मिली।
कहता ‘नाथूराम’ विनय यही सृजन से है श्याम करुणा बड़ी।।

Scroll to Top